श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  13.9.12-13 
एवमुक्त: प्रत्युवाच शृगालो वानरं तदा।
ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम्॥ १२॥
तत्कृते पापकीं योनिमापन्नोऽस्मि प्लवङ्गम।
तस्मादेवंविधं भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षित:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वानर के ऐसा पूछने पर सियार ने उसे उत्तर दिया - 'भैया वानर! मैंने ब्राह्मण को देने का वचन दिया था, पर उसे नहीं दिया। इसी कारण मुझे इस पाप योनि में जन्म मिला है और उसी पाप के कारण भूख लगने पर मुझे ऐसा घिनौना भोजन करना पड़ता है।'॥12-13॥
 
When the monkey asked this, the jackal replied to him - 'Brother monkey! I had promised to give it to the Brahmin but did not give it to him. Because of this I have been born in this sinful form and because of that sin, when I am hungry, I have to eat such disgusting food.'॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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