श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  13.9.10-11 
तत: परासून् खादन्तं शृगालं वानरोऽब्रवीत्।
श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन्॥ १०॥
किं त्वया पापकं पूर्वं कृतं कर्म सुदारुणम्।
यस्त्वं श्मशाने मृतकान् पूतिकानत्सि कुत्सितान्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर एक दिन श्मशान में एक सियार को शव खाते देखकर उस बन्दर को अपना पूर्वजन्म याद आ गया और उसने पूछा - 'भाई! तुमने पूर्वजन्म में ऐसा कौन-सा भयंकर पाप किया था, जिसके कारण तुम श्मशान में घृणित और दुर्गन्धयुक्त शव खा रहे हो?'॥10-11॥
 
Thereafter one day, seeing a jackal eating a corpse in a cremation ground, the monkey remembered his previous life and asked - 'Brother! What terrible sin did you commit in your previous life, due to which you are eating disgusting and foul-smelling corpses in a cremation ground?'॥ 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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