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mahabharat 13.88.32: यह अग्निपुत्र भगवान स्कन्द की स्वर्ण मूर्ति धारण करता है, सदा कुंवारी रहकर देवताओं का सेनापति बना ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 13.88: कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 88: कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.88.32 
हिरण्यमूर्तिर्भगवानेष एव च पावकि:।
सदा कुमारो देवानां सैनापत्यमवाप्तवान्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
यह अग्निपुत्र भगवान स्कन्द की स्वर्ण मूर्ति धारण करता है, सदा कुंवारी रहकर देवताओं का सेनापति बना ॥32॥
 
This son of Agni wears a golden idol of Lord Skanda. He remained eternally virgin and became the commander of the gods. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)