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mahabharat 13.87.84: तब से सुवर्ण का नाम जटारूपा हो गया। वह रत्नों में श्रेष्ठ रत्न और आभूषणों में श्रेष्ठ आभूषण है। 84॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  13.87.84 
तत: प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहृतम्।
रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
तब से सुवर्ण का नाम जटारूपा हो गया। वह रत्नों में श्रेष्ठ रत्न और आभूषणों में श्रेष्ठ आभूषण है। 84॥
 
Since then the name Suvarna became Jatarupa. He is the best gem among gems and the best ornament among jewellery. 84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)