श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  13.87.76 
एवंरूप: स भगवान‍् पुत्रस्ते हव्यवाहन।
सूर्यवैश्वानरसम: कान्त्या सोम इवापर:॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
हव्यवाहन! आपका तेजस्वी पुत्र ऐसा ही रूप वाला है। वह सूर्य और आपके समान तेजस्वी है तथा द्वितीय चन्द्रमा के समान तेजस्वी है। 76.
 
Havyavaahan! Your glorious son is of such a form. He is as radiant as the Sun and you and as lustrous as the second moon. 76.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)