श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  13.87.69 
समर्था धारणे चापि रुद्रतेज:प्रधर्षिता।
नाशकत् तं तदा गर्भं संधारयितुमोजसा॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि गंगाजी उस गर्भ को धारण करने में समर्थ थीं; फिर भी रुद्र के पराक्रम से पराजित होने के कारण वे उसे बलपूर्वक धारण न कर सकीं ॥69॥
 
Although Gangaji was capable of conceiving that fetus; Even then, being defeated by the might of Rudra, she could not hold it by force. 69॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)