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mahabharat 13.87.63: हे तपस्वियों में श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस बालक को गर्भ में धारण करने की शक्ति नहीं रही। मैं असह्य पीड़ा के कारण इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छा से नहीं॥ 63॥   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  13.87.63 
धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर।
उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दु:खान्न तु कामात् कथंचन॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
हे तपस्वियों में श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस बालक को गर्भ में धारण करने की शक्ति नहीं रही। मैं असह्य पीड़ा के कारण इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छा से नहीं॥ 63॥
 
O Pavaka, the best among ascetics! I no longer have the strength to carry this child to term. I am going to give it up out of unbearable pain. Not voluntarily.॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)