श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  13.87.59 
अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा।
वित्रस्तोद्‍भ्रान्तनयना गंगा विस्रुतलोचना॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
उस आकस्मिक गर्जना से भयभीत होकर गंगाजी की आँखें लुढ़कने लगीं और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे ॥59॥
 
Frightened by that sudden roar, Gangaji's eyes began to roll and tears began to flow from her eyes. ॥ 59॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)