श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.87.58 
आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजा: समन्विते।
गंगायामसुर: कश्चिद् भैरवं नादमानदत्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जब अग्निदेव द्वारा गंगा में उत्पन्न वह तेजस्वी भ्रूण बढ़ रहा था, तब एक असुर (दैत्य) अचानक वहाँ आया और भयंकर एवं जोर से गर्जना करने लगा ॥58॥
 
When the brilliant embryo created in the Ganges by Agni was growing, an Asura (demon) suddenly came there and roared terrifyingly and loudly. ॥58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)