श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.87.50 
अग्निरुवाच
ब्रूत यद् भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुरा:।
भवतां तु नियोज्योऽस्मि मा वोऽत्रास्तु विचारणा॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
अग्नि ने कहा - हे देवताओं! मैं तुम्हारा कार्य अवश्य पूर्ण करूँगा, सो कहो। मैं तुम सबकी आज्ञा मानता हूँ। इस विषय में तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए ॥50॥
 
Agni said - O Gods! I will definitely complete your work, so tell me. I obey you all. You should not think otherwise in this matter. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)