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mahabharat 13.87.2: दादाजी! हे भगवान! हम उस राक्षस से बहुत डरते हैं। कृपया उससे हमारी रक्षा करें, क्योंकि हमारे पास और कोई उपाय नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.87.2 
तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह।
परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति न:॥ २॥
 
 
अनुवाद
दादाजी! हे भगवान! हम उस राक्षस से बहुत डरते हैं। कृपया उससे हमारी रक्षा करें, क्योंकि हमारे पास और कोई उपाय नहीं है।
 
Grandfather! O God! We are very afraid of that demon. Please protect us from him; because there is no other way for us.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)