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mahabharat 13.87.168: अतः हे मनुष्यों के स्वामी! अब आप भी ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दान करें। सोना दान करने से आप पापों से मुक्त हो जायेंगे। (168)   |   mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  13.87.168 
तस्मात् त्वमपि विप्रेभ्य: प्रयच्छ कनकं बहु।
ददत्सुवर्णं नृपते किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसि॥ १६८॥
 
 
अनुवाद
अतः हे मनुष्यों के स्वामी! अब आप भी ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दान करें। सोना दान करने से आप पापों से मुक्त हो जायेंगे। (168)
 
Therefore, O Lord of men! Now you too should donate a lot of gold to the Brahmins. By donating gold you will be freed from sins. 168.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम पञ्चाशीतितमोऽध्याय:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्तिविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)