श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  13.87.161 
अग्निमित्येव तत् प्राहु: प्रदानं च सुखावहम्।
यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम्॥ १६१॥
 
 
अनुवाद
सोना अग्निरूप कहा गया है। इसका दान सुखदायक है। यह बहुत से गुणों का निर्माता और अन्न की इच्छा को बढ़ाने वाला माना गया है॥161॥
 
Gold is said to be the form of fire. Its donation brings happiness. It is considered to be the creator of a lot of virtues and the promoter of the desire for grains.॥ 161॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)