Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.87.114: अग्नि की ज्वालाएँ ही ग्यारहवें रुद्र और परम तेजस्वी बारह आदित्य हैं तथा उस यज्ञ में जो अन्य अंगारे थे, वे ही आकाश में नक्षत्रों में प्रकाशपुंज के रूप में विद्यमान हैं ॥114॥ | mahabharat अध्याय 13.87: ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अर्चिषो याश्च ते रुद्रास्तथाऽऽदित्या महाप्रभा:।
उद्दिष्टास्ते तथांगारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिता:॥ ११४॥
अनुवाद
अग्नि की ज्वालाएँ ही ग्यारहवें रुद्र और परम तेजस्वी बारह आदित्य हैं तथा उस यज्ञ में जो अन्य अंगारे थे, वे ही आकाश में नक्षत्रों में प्रकाशपुंज के रूप में विद्यमान हैं ॥114॥
The flames of fire are the eleventh Rudra and the most brilliant twelve Adityas, and the other embers that were there in that yagya are present in the form of a beam of light in the constellations in the sky. 114॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥