श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  13.86.82 
ते दीनमनस: सर्वे देवता ऋषयश्च ये।
प्रजग्मु: शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम्॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
वे सब देवता और ऋषिगण विनीत होकर अविनाशी एवं सर्वव्यापी देवता भगवान ब्रह्मा की शरण में गए ॥82॥
 
All those gods and sages became humble and took refuge in Lord Brahma, the immortal and omnipresent deity. 82॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्याय:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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