श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.86.8 
कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिण:।
कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् लोग स्वर्ण के दान को अधिक क्यों मानते हैं? और यज्ञ-कर्म में दक्षिणा के लिए स्वर्ण की प्रशंसा क्यों की जाती है? ॥8॥
 
Why do wise scholars respect the donation of gold more? And why is gold praised for dakshina in yajna-karma? ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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