श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  13.86.78 
उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम्।
तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम्॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
वह अद्भुत प्रकाश अग्नि में गिरकर ऊपर की ओर बढ़ने लगा। अग्नि के साथ मिलकर वह प्रकाश एक स्वयंभू पुरुष के रूप में प्रकट होने लगा। 78.
 
That wonderful light fell into the fire and began to grow and rise upwards. That light combined with the fire began to manifest itself in the form of a self-born person. 78.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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