vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना
»
श्लोक 77
श्लोक
13.86.77
रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा।
प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि॥ ७७॥
अनुवाद
यद्यपि रुद्रदेव ने उस समय अपने अतुलनीय तेज (वीर्य) को रोक रखा था, तथापि उनका थोड़ा-सा वीर्यपात हुआ और वे वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े।
Although Rudradev had at that time restrained his matchless energy (semen), yet he ejaculated a little and fell on the earth there itself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×