श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  13.86.72 
इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहन:।
ऊर्ध्वरेता: समभवत् तत: प्रभृति चापि स:॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
देवताओं से ऐसा कहकर बैलवाहन भगवान शंकर ने अपना 'रेत' अर्थात् वीर्य ऊपर की ओर उठा दिया। तब से वे 'ऊर्ध्वरेता' नाम से प्रसिद्ध हुए ॥72॥
 
Saying this to the gods, Lord Shankar, the bull-carrying vehicle, raised his 'sand' i.e. semen upwards. Since then he became famous by the name ‘Urdhvareta’. 72॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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