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mahabharat 13.86.70: अतः हे प्रभु! हम पर कृपा कीजिए। हे प्रभु! उत्तम! हमारी कामना है कि देवी पार्वती के गर्भ से आपको कोई पुत्र न हो। आप धैर्यपूर्वक अपने भीतर अपना प्रज्वलित तेज धारण कीजिए। 70॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  13.86.70 
तस्मात् प्रसादं भगवन् कर्तुमर्हसि न: प्रभो।
न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवत: सुरसत्तम।
धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
अतः हे प्रभु! हम पर कृपा कीजिए। हे प्रभु! उत्तम! हमारी कामना है कि देवी पार्वती के गर्भ से आपको कोई पुत्र न हो। आप धैर्यपूर्वक अपने भीतर अपना प्रज्वलित तेज धारण कीजिए। 70॥
 
So God! Please be kind to us. Lord! Best! We wish that you should not have any son from the womb of Goddess Parvati. With patience you keep your burning brilliance within yourself. 70॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)