श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  13.86.59 
मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन।
प्रजापते: कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
भृगु नन्दन! मैंने पूर्व पुराणों में प्रजापति का यह न्यायोचित कथन सुना है।
 
Bhrigu Nandan! I have heard this justifiable statement made by Prajapati in the earlier Puranas. 59.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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