श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.86.56 
देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ।
अग्निर्हि देवता: सर्वा: सुवर्णं च तदात्मकम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग सोना देते हैं, वे देवताओं को दान देते हैं, क्योंकि अग्नि सभी देवताओं का स्वरूप है और सोना अग्नि का ही स्वरूप है।
 
Those who give gold, they give donations to the gods, because Agni is the manifestation of all gods and gold is the form of Agni.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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