श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  13.86.52 
तस्मात् सर्वपवित्रेभ्य: पवित्रं परमं स्मृतम्।
भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
अतः नरश्रेष्ठ! संसार में भूमि, गौ, रत्न आदि जितने भी पवित्र पदार्थ हैं, उनमें सुवर्ण सबसे पवित्र माना गया है; इसे अच्छी तरह जान लो॥52॥
 
So Narashrestha! Of all the sacred things in the world like land, cows, gems etc., gold is considered to be the holiest of them all; Know this very well. 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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