श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  13.86.51 
मुकुटैरङ्गदयुतैरलंकारै: पृथग्विधै:।
सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
हे भृगुश्रेष्ठ! वे स्वर्ण के मुकुट, बाजूबंद तथा नाना प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हैं।
 
O best of Bhrigu! He is adorned with a crown, armlets and various other types of ornaments made of gold.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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