श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.86.49 
जगत‍् सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशि: समुत्थित:।
सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण जगत् का मन्थन करने पर जो तेज उत्पन्न हुआ है, वह स्वर्ण है। अतः ब्रह्मर्षे! अज आदि समस्त पदार्थों में यह श्रेष्ठ रत्न है। 49॥
 
The amount of glory that has emerged after churning the entire world is gold. So Brahmarshe! This is the best gem among all things like Aj etc. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)