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mahabharat 13.86.46-47h: यह स्वर्णिम अग्नि है और सोम का स्वरूप है। तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए। बकरी, अग्नि, भेड़, नेपच्यून और घोड़ा सूर्य के अंश हैं। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 46-47h
 
 
श्लोक  13.86.46-47h 
अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये॥ ४६॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेष: सूर्योऽश्व इति दर्शनम्।
 
 
अनुवाद
यह स्वर्णिम अग्नि है और सोम का स्वरूप है। तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए। बकरी, अग्नि, भेड़, नेपच्यून और घोड़ा सूर्य के अंश हैं। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिए।
 
This is golden fire and the form of Soma. You should definitely know this. Goat, fire, sheep, Neptune and horse are parts of Surya. Such a vision should be kept.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)