श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.86.40 
यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमा:।
प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधना:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे मुनियों! तपस्वियों! यदि आप सब मुझ पर कृपा करना चाहते हैं, तो मुझे बताइए कि मेरी शुद्धि का क्या उपाय है?॥40॥
 
O sages! Ascetics! If you all wish to bestow your favour upon me, then tell me, what is the means to purify me?'॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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