| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना » श्लोक 38-40h |
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| | | | श्लोक 13.86.38-40h  | ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर।
ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम्॥ ३८॥
तमेवार्थं महातेजा: पप्रच्छ भृगुनन्दन:।
जाता मतिर्मे विप्रेन्द्रा: कथं पूयेयमित्युत॥ ३९॥
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा। | | | | | | अनुवाद | | ‘और वे मुनि जो कुछ तुम्हें कहें, उसका तुम प्रसन्नतापूर्वक पालन करो।’ तब परम तेजस्वी भृगुनंदन परशुरामजी ने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यप के पास जाकर पूछा - ‘हे ब्राह्मणों! मैं पवित्र होना चाहता हूँ। आप मुझे बताइए कि किस अनुष्ठान या किस दान से मैं पवित्र हो सकता हूँ?’॥38-39 1/2॥ | | | | ‘And whatever those wise sages tell you, follow that happily.’ Then the very illustrious Bhrigu Nandan Parashurama went to Vasishtha, Narada, Agastya and Kashyap and asked – ‘O Brahmins! I want to become pure. Tell me, by which ritual or by which donation can I become pure?॥ 38-39 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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