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mahabharat 13.86.3: उनमें से केवल वही पवित्र हैं जो नियमित रूप से पृथ्वी का दान करते हैं। हे कुरुपुत्र! आपने मुझसे सभी धर्मों का वर्णन किया है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 13.86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.86.3 
पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम्।
सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उनमें से केवल वही पवित्र हैं जो नियमित रूप से पृथ्वी का दान करते हैं। हे कुरुपुत्र! आपने मुझसे सभी धर्मों का वर्णन किया है॥3॥
 
Among them only those are pure who regularly donate the earth. O son of Kuru! You have described all the religions to me.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)