श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  13.86.29-30h 
इतिहासमिमं चापि शृणु राजन् पुरातनम्॥ २९॥
जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च।
 
 
अनुवाद
राजन! अब जमदग्निनन्दन परशुरामजी से सम्बन्धित एक प्राचीन इतिहास (सोने की उत्पत्ति तथा उसके माहात्म्य के विषय में) सुनिए। विभो! यह कथा धन और आयु की वृद्धि करने वाली है। 29 1/2॥
 
Rajan! Now listen to an ancient history (about the origin of gold and its greatness) which is related to Jamdagninandan Parshuramji. Vibho! This story is about increasing wealth and lifespan. 29 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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