श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 27-29h
 
 
श्लोक  13.86.27-29h 
दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते॥ २७॥
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन्।
ततोऽहं विस्मितो राजन् प्रतिबुद्धो विशाम्पते॥ २८॥
सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ।
 
 
अनुवाद
जो लोग स्वर्ण दान करते हैं, वे अपने से पूर्व और पश्चात की दस पीढ़ियों का उद्धार करते हैं।' हे राजन! जब मेरे पूर्वजों ने ऐसा कहा, तब मैं निद्रा से जाग उठा। उस समय स्वप्न का स्मरण करके मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। हे प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने स्वर्ण दान करने का निश्चय किया। 27-28 1/2।
 
Those who donate gold, uplift their ten generations before and after them.' O King! When my forefathers said this, I woke up from my sleep. At that time, remembering the dream, I was very surprised. O Prajanath! Best of the Bharatas! Then I decided to donate gold. 27-28 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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