श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  13.86.26-27h 
एवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहा:॥ २६॥
पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत्।
 
 
अनुवाद
‘धर्मज्ञ! ऐसा करने से हम और हमारे सभी पूर्वज पवित्र हो जायेंगे; क्योंकि स्वर्ण सबसे पवित्र वस्तु है॥26 1/2॥
 
‘Dharmagya! By doing this we and all our forefathers will become pure; because gold is the most pure thing.॥ 26 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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