श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  13.86.25-26h 
तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ॥ २५॥
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति।
 
 
अनुवाद
‘भरतश्रेष्ठ! आपने यह सब कार्य बहुत अच्छा किया; किन्तु अब हमारी प्रार्थना से आप कुछ स्वर्ण दान करें, साथ ही भूमि और गौदान का भी दान करें।’ 25 1/2॥
 
‘Bharatshrestha! You have done all this work very well; But now, on our request, donate some gold as well as a passive donation of land and cattle. 25 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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