श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  13.86.19-20 
ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम्॥ १९॥
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन्।
ततो दर्भेषु तत् सर्वमददं भरतर्षभ॥ २०॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! ऐसा सोचकर मैंने अपने पिता के स्पष्ट दिखाई देने वाले हाथ का आदर नहीं किया। शास्त्रों को प्रमाण मानकर तथा पिण्डदान सम्बन्धी सूक्ष्म विधि को ध्यान में रखकर उन्होंने कुशाओं पर ही समस्त पिण्डों का दान किया। 19-20॥
 
Bharatshrestha! Thinking this, I did not respect my father's clearly visible hand. Taking the scriptures as proof and keeping in mind the subtle method related to donating the dead bodies, he donated all the dead bodies on Kushas only. 19-20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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