श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 16-19h
 
 
श्लोक  13.86.16-19h 
तमुत्थितमहं दृष्ट्वा परं विस्मयमागमम्।
प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ॥ १६॥
ततो मे पुनरेवासीत् संज्ञा संचिन्त्य शास्त्रत:।
नायं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो॥ १७॥
पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम।
साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितर: क्वचित्॥ १८॥
गृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देय: कुशेष्विति।
 
 
अनुवाद
उन्हें खड़े देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! वास्तव में मेरे पिता पिण्डदान लेने के लिए उपस्थित थे। प्रभु! किन्तु जब मैंने शास्त्रीय विधि का विचार किया, तो सहसा मेरे मन में आया कि वेदों में हाथ पर पिंडदान करने का कोई विधान नहीं है। पितर कभी भी साक्षात् प्रकट होकर मनुष्य के हाथ से पिंड नहीं लेते। शास्त्रों का आदेश है कि पिण्डदान कुशाओं पर ही करना चाहिए। 16—18 1/2
 
I was surprised to see her standing up. Bharatshrestha! Actually my father was present to accept Pindaka donation. Lord! But when I thought about the classical method, then suddenly it came to my mind that there is no provision in the Vedas for a person to give a pinda on his hand. The ancestors never appear in person and take the pinda from the hands of a human being. The command of the scriptures is that Pind Daan should be performed on Kushas. 16—18 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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