श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.86.15 
ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिरांगद:।
प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद् विशाम्पते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! उसी समय पिण्डदान के लिए बिछाई गई कुशा में से एक अत्यंत सुंदर भुजा निकली। उस विशाल भुजा में बाजूबंद आदि अनेक आभूषण शोभा पा रहे थे॥15॥
 
Prajanath! At this very moment a very beautiful arm came out from the kusha grass that had been spread for the Pinddaan. Many ornaments like armlets etc. were adorning that huge arm.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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