श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.86.12 
तत्रागम्य पितु: पुत्र श्राद्धकर्म समारभम्।
माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने अपने पिता के लिए श्राद्धकर्म आरम्भ किया। उस समय मेरी माता गंगा ने भी इस कार्य में बहुत सहायता की।॥12॥
 
Son! After reaching there I started the shraddha karma for my father. At that time my mother Ganga also helped a lot in this work.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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