श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 86: भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.86.1 
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम्।
विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - पितामह! आपने समस्त मनुष्यों के लिए, विशेषतः धर्मपरायण राजाओं के लिए, अत्यन्त उत्तम गोदान का वर्णन किया है। 1॥
 
Yudhishthir said – Grandfather! You have described the most excellent Godan for all human beings, especially for kings who have an eye on religion. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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