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mahabharat 13.85.42-44h: हे कमलनेत्र इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तप, पुरुषार्थ, इन्द्रिय संयम, नाना प्रकार के दान, पुण्य, तीर्थयात्रा, महान तप और अन्य शुभ कर्मों के अनुष्ठान से ही गोलोक प्राप्त होता है। 42-43 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.85: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 85: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना  »  श्लोक 42-44h
 
 
श्लोक  13.85.42-44h 
ब्रह्मचर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च॥ ४२॥
दानैश्च विविधै: पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात्।
तपसा महता चैव सुुकृतेन च कर्मणा॥ ४३॥
शक्य: समासादयितुं गोलोक: पुष्करेक्षण।
 
 
अनुवाद
हे कमलनेत्र इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तप, पुरुषार्थ, इन्द्रिय संयम, नाना प्रकार के दान, पुण्य, तीर्थयात्रा, महान तप और अन्य शुभ कर्मों के अनुष्ठान से ही गोलोक प्राप्त होता है। 42-43 1/2॥
 
Lotus-eyed Indra! Goloka can be attained only by celibacy, penance, effort, restraint of senses, various types of charity, virtue, pilgrimage, great penance and rituals of other auspicious deeds. 42-43 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)