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mahabharat 13.83.42: पवित्र जल पीकर शुद्ध होकर, गौओं के साथ बैठकर मन ही मन गोमती मंत्र (गोमा अग्निवामा अश्वि आदि) का जप करना चाहिए। ऐसा करने से वह अत्यंत शुद्ध और निर्मल (पापों से मुक्त) हो जाता है।॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 13.83: गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 83: गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.83.42 
गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत्।
पूताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मल:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
पवित्र जल पीकर शुद्ध होकर, गौओं के साथ बैठकर मन ही मन गोमती मंत्र (गोमा अग्निवामा अश्वि आदि) का जप करना चाहिए। ऐसा करने से वह अत्यंत शुद्ध और निर्मल (पापों से मुक्त) हो जाता है।॥ 42॥
 
After purifying oneself by sipping holy water, one should chant the Gomati mantra (Goma Agnivama Ashvi etc.) in his mind while in the company of cows. By doing so, he becomes extremely pure and clean (free from sins).॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)