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श्लोक 13.82.17  |
भीष्म उवाच
वरमिदमिति भूमिदो विचिन्त्य
प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा।
व्यसृजत नियतात्मवान् द्विजेभ्य:
सुबहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्मजी कहते हैं - महर्षि वशिष्ठ के ये वचन सुनकर भूमिदान करने वाले पुण्यात्मा महामना राजा सौदास ने 'यह बहुत ही उत्तम दान है' ऐसा सोचकर ब्राह्मणों को बहुत सी गौएँ दान कीं। इससे उन्हें उत्तम लोकों की प्राप्ति हुई।॥17॥ |
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| Bhishmaji says - Hearing these words of Maharishi Vashishtha, Mahamana Raja Saudasa, the saintly soul who donated land, donated many cows to the Brahmins, thinking, 'This is a very noble act of charity.' Due to this he attained the best worlds. 17॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥
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