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mahabharat 13.81.27: गाय अपने शरीर पर जितने रोमों की संख्या रखती है, उतने वर्षों तक स्वर्ग में सम्मानपूर्वक रहती है। फिर जब उसके पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब वह स्वर्ग से उतरकर इस मनुष्य लोक में आती है और एक समृद्ध कुल में जन्म लेती है॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 13.81: गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 81: गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.81.27 
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा-
स्तावन्ति वर्षाणि महीयते स:।
स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके
प्रसूयते वै विपुले गृहे स:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
गाय अपने शरीर पर जितने रोमों की संख्या रखती है, उतने वर्षों तक स्वर्ग में सम्मानपूर्वक रहती है। फिर जब उसके पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब वह स्वर्ग से उतरकर इस मनुष्य लोक में आती है और एक समृद्ध कुल में जन्म लेती है॥ 27॥
 
The cow lives with respect in heaven for as many years as the number of hairs on its body. Then when its merits are reduced, it descends from heaven and comes to this human world and takes birth in a prosperous family.॥ 27॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकोनाशीतितमोऽध्याय:॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)