श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 81: गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.81.24 
गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसंचयान्।
विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन् विराजते॥ २४॥
 
 
अनुवाद
राजन! जो पुरुष भगवान् की गोद में प्रेमपूर्वक तत्पर रहता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी विमान में बैठकर बादलों को चीरकर स्वर्ग में जाता है और शोभा पाता है॥24॥
 
Rajan! The man who remains ready with love in the lap of God, sits in a plane resplendent like the sun, pierces the clouds and goes to heaven and gets adorned. 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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