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श्लोक 13.80.25  |
एवं रात्रौ दिवा चापि समेषु विषमेषु च।
महाभयेषु च नर: कीर्तयन् मुच्यते भयात्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य इस प्रकार गोमाता का नाम जपता है, चाहे रात्रि में हो या दिन में, सम या विषम अवस्था में तथा महान भय होने पर भी, वह भय से मुक्त हो जाता है॥25॥ |
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| The person who chants the name of Gomataka in this way, whether at night or during the day, in even or odd conditions and even in the face of great fear, becomes free from fear.' 25॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अष्टसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७८॥
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