श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 80: वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  13.80.22 
गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य य:।
सर्वरत्नमयीं दद्यान्न स शोचेत् कृताकृते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य 'गोमा अग्निविमा अश्वि' आदि गोमती मंत्रों से अभिमंत्रित करके ब्राह्मण को सब प्रकार के रत्नों से युक्त तिलकी धेनु देता है, उसे अपने द्वारा किए गए शुभ एवं मंगलमय कर्मों के लिए पश्चाताप नहीं होता॥22॥
 
The man who invites Tilki Dhenu with all types of gems to a Brahmin after inviting him with Gomati mantras like 'Goma Agnivima Ashvi' etc., does not regret for the auspicious and auspicious deeds he has done. 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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