श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 80: वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  13.80.1-2 
भीष्म उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठमृषिसत्तमम्।
इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो वदतां वर:॥ १॥
सर्वलोकचरं सिद्धं ब्रह्मकोशं सनातनम्।
पुरोहितमभिप्रष्टुमभिवाद्योपचक्रमे॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन ! एक समय वक्ताओं में श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदास, वेदज्ञान के भण्डार, सम्पूर्ण जगत् में विचरण करने वाले महान सनातन ऋषि वशिष्ठजी को प्रणाम करके इस प्रकार पूछने लगे कि उनके पुरोहित कौन थे ॥1-2॥
 
Bhishmaji says – King! Once upon a time, Ikshvaku dynasty king Saudasa, the best among the speakers, started asking in this manner after paying obeisance to the great eternal sage Vashishthaji, the storehouse of Vedic knowledge, who roamed all over the world, who was his priest. 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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