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mahabharat 13.8.17: हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले राजन! मैंने मन, वचन और कर्म से ब्राह्मणों का कुछ उपकार किया है। उसी के कारण आज मेरी यह दशा होने पर भी मुझे कोई दुःख नहीं हो रहा है॥17॥   |   mahabharat अध्याय 13.8: श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 8: श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.8.17 
कर्मणा मनसा वापि वाचा वापि परंतप।
यन्मे कृतं ब्राह्मणेभ्यस्तेनाद्य न तपाम्यहम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले राजन! मैंने मन, वचन और कर्म से ब्राह्मणों का कुछ उपकार किया है। उसी के कारण आज मेरी यह दशा होने पर भी मुझे कोई दुःख नहीं हो रहा है॥17॥
 
O King who torments his enemies! I have done some favours to Brahmins by my mind, words and deeds. Due to that, even though I am in this condition today, I do not feel any pain. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)