श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 79: कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.79.35 
तथैव तेभ्योऽपि ददौ द्विजेभ्यो
गवां सहस्राणि शतानि चैव।
यज्ञान् समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे
लोकान् विजेतुं परमां च कीर्तिम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार यज्ञों की दक्षिणा प्राप्त करने, पुण्य लोकों को जीतने तथा संसार में अपनी महान कीर्ति फैलाने के लिए राजा ने उन्हीं ब्राह्मणों को सैकड़ों और हजारों गौएँ दान में दीं ॥35॥
 
Similarly, to obtain dakshina for the sacrifices, to conquer the virtuous worlds and to spread his great fame in the world, the king donated hundreds and thousands of cows to the same brahmins. ॥ 35॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रभवकथने सप्तसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७७॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौओंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)