श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 79: कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  13.79.20-21h 
स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठत:।
शिरस्यवाप तत् क्रुद्ध: स तदैक्षत च प्रभु:॥ २०॥
ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव।
 
 
अनुवाद
एक दिन भगवान शंकर पृथ्वी पर खड़े थे। उस समय सुरभि बछड़े के मुख से झाग निकलकर उनके मस्तक पर गिरा। इससे वे क्रोधित हो उठे और रोहिणी की ओर अपने माथे वाले नेत्र से इस प्रकार देखने लगे मानो उसे जलाकर भस्म कर देंगे।
 
One day Lord Shankar was standing on the earth. At that time foam came out of the mouth of a Surabhi calf and fell on his forehead. This made him angry and he started looking at Rohini with his forehead-borne eye as if he would burn her to ashes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)