श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 79: कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.79.17 
स गतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धं सुरभिमुद्‍‍गिरन्।
ददर्शोद्‍गारसंवृत्तां सुरभिं मुखजां सुताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब वे अमृत पीकर पूर्णतया तृप्त हो गए, तब उनके मुख से सुखद गंध आने लगी। सुरभि की सुगंध निकलते ही 'सुरभि' नामक एक गौ प्रकट हुई, जिसे प्रजापति ने उनके मुख से प्रकट हुई पुत्री के रूप में देखा। 17॥
 
When he became completely satisfied after drinking the nectar, a pleasant smell started emanating from his mouth. As soon as the fragrance of Surabhi came out, a cow named 'Surabhi' appeared, which Prajapati saw in the form of a daughter appearing from his mouth. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)